छोटे शहरों के अनेक परिवार अंग्रेज़ी को अवसरों की भाषा मानते हैं, और यह अपेक्षा स्वाभाविक है। समस्या तब होती है जब अंग्रेज़ी सीखने को मातृभाषा भूलने से जोड़ दिया जाता है। भाषा कोई प्रतियोगिता नहीं है; एक भाषा में मजबूत सोच दूसरी भाषा सीखने में सहायता करती है।
बच्चा सबसे पहले उस भाषा में दुनिया समझता है जो घर में सुनता है। यदि उसे नई अवधारणा परिचित भाषा में समझ आती है, तो वह अंग्रेज़ी शब्दावली भी अधिक अर्थपूर्ण ढंग से सीख सकता है। केवल pronunciation और memorised sentences fluency नहीं बनाते। वास्तविक fluency समझ, vocabulary, listening और confidence से बनती है।
विद्यालय में English exposure नियमित और स्वाभाविक होना चाहिए—stories, conversation, reading corners, presentations और classroom instructions के माध्यम से। गलती पर उपहास या कठोर correction बच्चे को बोलने से रोकता है। Safe language environment अधिक प्रभावी होता है।
साथ ही Hindi या स्थानीय भाषा में पढ़ने और अभिव्यक्ति की क्षमता कमजोर नहीं होनी चाहिए। मातृभाषा साहित्य, संवेदना और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ती है। जो बच्चा अपनी पहली भाषा में विचार स्पष्ट कर सकता है, वह दूसरी भाषा में भी बेहतर communicator बन सकता है।
घर में parents को केवल English बोलने का दबाव बनाने की आवश्यकता नहीं है। वे अच्छी कहानियाँ पढ़ सकते हैं, नए शब्दों पर चर्चा कर सकते हैं और बच्चे को दोनों भाषाओं में अनुभव बताने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। भाषा का उद्देश्य संवाद है, प्रदर्शन नहीं।
Teachers को translanguaging का संतुलित उपयोग करना चाहिए—कठिन concept को समझाने के लिए परिचित भाषा का सहारा, और धीरे-धीरे target language में expression का विस्तार। यह shortcut नहीं, learning bridge है।
मेरा मानना है कि भविष्य उसी बच्चे का है जो कई भाषाओं में सम्मान और सहजता के साथ संवाद कर सके। English उसे दुनिया से जोड़ती है; मातृभाषा उसे स्वयं से जोड़ती है।
सही शिक्षा दोनों में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं करती। वह बच्चे को दोनों की शक्ति देती है—स्थानीय जड़ों के साथ वैश्विक आत्मविश्वास।
